सरकारी अधिकारियों की वार्षिक संपत्ति प्राप्तियों का ब्यौरा सार्वजनिक होगा

केन्द्रीय सूचना आयोग ने अपने एक एतिहासिक निर्णय में कहा है कि सभी सरकारी अधिकारी को उसके वार्षिक सम्पत्ति प्राप्तियों का ब्यौरा आम जनों को दिया जा सकता है। आयोग ने यह निर्णय श्री डाण् कौउस्थुब उपाध्याय द्वारा सूचना के अधिकार के तहत 1976 बेच के एक भारतीय प्रशासनिक अधिकारी श्री शिव बसंथ के पिछले तीन वर्ष के अचल सम्पत्ति के लेखा-जोखा की मांगे गए जानकारी के जवाब में दिया है।

श्री उपाध्याय में अपने याचिका में तीन प्रश्न किए थे। जिसमें पहला था कि अधिकारी बसंथ ने अपने या अपने किसी पारिवारिक सदस्य के नाम पर अचल सम्पत्ति के खरीदारी के लेन-देन की पूर्व सूचना संबंधित विभाग को दी है ?दूसरे प्रश्न में पूछा गया था कि अधिकारी बसंथ ने 18-ए, प्रथम मंजिल, रोयल केस्ट्ल, सेक्टर 56, सुशांत लोक, हरियाणा में जो प्रोपटी खरीदी है, क्या इसकी सूचना संबंधित विभाग को दी गई है? यदि हॉं तो उसके खरीदारी की तिथि, वित्तिय स्त्रोत आदि की जानकारी दी जाए। अंतिम सवाल में पूछा गया था कि उसे अधिकारी बसंथ के संस्था ``आयुष´´ के सविच के रुप में पिछले तीन वर्ष की अचल सम्पत्ति प्राप्तियों की नकल दी जाए। इसके जवाब में पहले दो प्रश्नों का जानकारी सूचना अधिकारी ने समय पर दे दिया। लेकिन तीसरे प्रश्न का जवाब देने से इन्कार कर दिया। साथ ही दलील दी कि सूचना के अधिकार के धारा 8 के तहत ऐसी सूचना नहीं दी जा सकती है। ऐसी जानकारी आम जन को देने से निजता के हनन से संबंधित है।

इसके बाद में श्री उपाध्याय ने तीसरे प्रश्न के जवाब के लिए प्रथम अपील दायर की। इसके जवाब में अपीलीय अधिकारी में जवाब दिया कि ऎसी सूचना ऑल इंडिया सर्विस कंडक्ट रुल, 1968 के अनुसार सभी केन्द्र व राज्य सरकार के अधिकारियों के अचल सम्पत्तियों का आंकडे विभाग द्वारा रखी जाती है। और कहा कि ऐसे सूचना अधिकारियों के निजी होते है। जिसे आम जन को नहीं दी जा सकती। ऐसे सूचना केवल सीबीआई जैसी संस्थाओं को दी जा सकती है। इसके बाद श्री उपाध्याय ने केन्द्रीय सूचना आयोग में आवेदन दिया। साथ ही दलील दी कि सूचना के अधिकार धारा 8 के अन्र्तगत चल या अचल संपत्ति की सूचना देने से इन्कार नहीं किया जा सकता। साथ ही कहा कि इस कानून के खंड 4 के अनुसार सभी सरकारी अधिकारियों को उसके आधिकारिक वेवसाइट पर स्वयं दर्ज करने चाहिए।

श्री उपाध्याय ने उच्चतम न्यायालय के इससे मिलते जुलते दो केसों यूनीयन ऑफ इंडियन बनाम एसोसियसन फोर डेमोके्रटिक रिफोर्म एण्ड एनोदर के अपील संख्या 7178 वर्ष 2001 को और पीपुल यूनियन फोर सिविल लिबरर्टीज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया का संदर्भ दिया साथ ही दलील दी कि चुनाव में उम्मीदवार को खडे़ होने के लिए उसके सम्पित्त का ब्यौरा देना होता है जबकि वे कुछ समय के लिए सरकार में आते है तो जीवन भर सरकार में रहने वाले अधिकारियों को इस दायरें में क्यों नहीं आना चाहिए?

केन्द्रीय सूचना आयोग ने इसके खिलाफ जवाब दिया कि जब किसी व्यक्ति का निजता का अधिकार और सूचना के अधिकार की जानकारी प्रतियोगी हो जाए और मुद्दा जन हित का हो तो निजता का अधिकार को द्वितीय प्राथमिकता में गिना जाएगा । साथ ही आयोग ने जन सूचना अधिकारी से आदेश दिया कि याचिका कर्ता को उपयुक्त समय पर सूचना उपलब्ध करा दें साथ ही बसंथ को आदेश दिया कि वह निर्णय में संबंध में अपनी राय निश्चित समय पर लिखित या मौखिक रुप से आयोग को सूचित कर दें।

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