21 July 2017
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नरेन्द्र मोदी जी छत्तीसगढ़ के किसान त्रस्त है जल संसाधन मस्त है

नरेन्द्र मोदी जी छत्तीसगढ़ के किसान त्रस्त है जल संसाधन मस्त है महासमुंद जिले के सबसे प्राचीन बाँध के रूप में कोडर बाँध को जाना जाता है मगर कोडर बाँध की हकीकत इस विडियो में है, जगह – जगह पिंचिंग का कार्य उखड़ गया है, माननीय नरेन्द्र मोदी जी छत्तीसगढ़ के किसानो की हालत बहुत ख़राब है, आपके द्वारा भेजा गया धन राशी का कैसा उपयोग होता है वो इस विडिओ में है, सूचना के अधिकार को लागू हुये 11 साल से अधिक हो गया पर सूचना के अधिकार की धारा 4 के तहत जल संसाधन विभाग अपनी जानकारी स्वयं ( सुमोटो ) के तहत सार्वजनिक नहीं किया है, जबकि सूचना के अधिकार की धारा 4 कहती है, डिविजनो में होने वाले सभी खर्च, आबंटन , मस्टरोल, बिल तथा सभी वितीय जानकारी को वेबसाइट के माध्यम से अपलोड करना जरुरी है, इस पर माननीय उच्च न्यायलय, बिलासपुर का निर्णय भी है, जिसके अनुसार जल संसाधन को छोड अनेक विभाग सूचना के अधिकार की धारा 4 का कुछ हद तक पालन कर रही है, जल संसाधन विभाग में कई ऐसे सब इंजीनियर है जो की 20 साल से ज्यादा में एक ही स्थान में टिके है, चाहे किसी की सरकार आये और किसी की सरकार जावे मगर ये सब इंजीनियर का कोई बाल भी बाका नहीं कर सकता, भ्रष्टाचार की जड़ जल संसाधन विभाग में बहुत अंदर तक जमा हुवा है, कैसे एक सब इंजीनियर 10 साल की सेवा में मेवा खाते हुवे अपने बच्चे को निजी मेडिकल कालेज में 60 लाख रुपए का डोनेशन देकर पढ़ा लेता है, और छत्तीसगढ़ राज्य आर्थिक अपराध अनवेषण ब्यूरो कोई कार्यवाही नहीं करती है, यदि कोई कार्यवाही भी करती है तो छत्तीसगढ़ शासन उस जल संसाधन विभाग के उस पर कार्यवाही करने की बजाय उसको पदोन्नति देकर मलाईदार कुर्सी दे देता है, जबकि भ्रष्टाचारी को तो कड़ी से कड़ी सज़ा दी जानी चाहिये, जल संसाधन विभाग में १३ साल में १३ हजार से ज्यादा गभीर शिकायत आई है पर उस में कोई कार्यवाही नहीं होती छोटे से छोटे जाँच में कम से कम 5 साल लगते है जिस कारण किसानो के सिचाई के पैसे को भ्रष्टाचारी अधिकारी हजम कर जाते है,

नरेन्द्र मोदी जी छत्तीसगढ़ के बाधों की हालत देखिये

छत्तीसगढ़ के कोड़ार बाँध जो की महासमुंद जिले में है, जिस पर हर

वर्ष करोडो रुपए जल संसाधन विभाग के अधिकारी फुकते है, इसकी

विड़ीओं के द्वारा सच्चाई माननीय नरेन्द्र मोदी जी को पेश है. मोदी जी

आप देश से भ्रस्टाचार व बेईमानी को खत्म करने की बात करते है दूसरी

तरफ छत्तीसगढ़ के जल संसाधन विभाग में गले तक भ्रस्टाचार व बेईमानी

है, जिसका एक विड़ीओं आपके सामने है, आप जरा यह जाँच करवाए की

कोडर बाँध में गत ५ साल में किस – किस काम के लिए कितना कितना

पैसा खर्च हुवा और उसकी हकीकत क्या है ? आपने जिन्हे जल संसाधन

विभाग का रखवाला बनाया है वो तो जल संसाधन विभाग को नोट छापने

की मशीन समझता है इसी कारण ये रखवाला कुछ ही समय में १० हजार

करोड़ रुपए का आसामी बन गया है, इस रखवाला के यहाँ आयकर का छापा

क्यों नहीं पडता ये समझ के परे है,

बंगला खर्चा दो और जल संसाधन में बेईमानी करने की आज़ादी पावो

         कुछ लोग यह अफवाह उड़ाते है की १०-१५ परसेंट में जल संसाधन विभाग का टेंडर बिकता है जब हम इसका पता लगाने गये तो सच का पता नहीं चल पाया पर जल संसाधन विभाग के अधिकारी और कर्मचारी बंगला खर्चा के नाम से त्रस्त है, हर अधिकारी और कर्मचारी के जुबान पर बंगला खर्चा की चर्चा रहता है, आखिर बंगला खर्चा है क्या ? इसको समझने के लिए इस बात को समझना होगा की बंगला खर्चा के नाम पर रायपुर जिले के राजनैतिक खर्चे की वसूली होती है इसके लिए शासकीय योजनाओ के आबंटन का कुछ हिस्सा कमीशन के तौर पर लिया जाता है उसके बाद बेईमानी करने की छुट दी जाती है और जब इस बेईमानी की शिकायत शासन स्तर पर जाती है तो कोई कार्यवाही नहीं होती है,

जैसे की किसी ने शिकायत की थी की जल संसाधन विभाग, कवर्धा में २,५०,९४,५८९ रुपए का सीमेंट खरीदी बिना छत्तीसगढ़ राज्य भंडार व क्रय नियम २००२ का पालन किये हुवा है जिस पर शिकायतकर्ता ने लिखा था की वैट चार्ज, आयकर कटौत्री नहीं कर सप्लायर को लाभ पहुचाया गया इस पर अधिकारियो ने झूठा प्रतिवेदन दे दिया जिसके बाद कोई कार्यवाही नहीं हुई,

­      दरअसल बेईमानी का सबूत होने के बाद भी कार्यवाही इसलिए नहीं होती क्योकि शिकायतकर्ता कोर्ट नहीं जाता, यदि इसी शिकायत को पहले थाने में देते, यदि थानेदार एफ.आई.आर.नहीं करता तो ३० दिन बाद एस.पी.को देते फिर ३० दिन बाद यदि एस.पी. कार्यवाही नहीं करती तो जिला व सत्र न्यायालय में किसी विद्वान वकील साहब के द्वारा परिवाद दायर करते तो दोषियों के विरुद्ध एफ.आई.आर.होना तय रहता फिर न्यायालय से जमानत लेनी पड़ती पर ज्यादा मामलो पर शिकायतकर्ता थाने में शिकायत नहीं करता है,

       इसी प्रकार बी.जे.पी.के मडल अध्यक्ष ने एक अनुविभागीय अधिकारी के खिलाफ ये शिकायत की वो मुख्यालय में ना रह कर बेमेतरा से आना जाना करता है वही जनप्रतिनिधियों से कोई भी व्यवहार नहीं रखता तथा महिलाओ से अभद्र व्यवहार करता है, जनपद पंचायत की बैठक में सही तैयारी के साथ नहीं आता वही उपयंत्रियो और मेट से तालमेल नहीं रखता है, शासकीय सेवक होकर राजनैतिक बयान देते है जिन कारणों से ४ साल से विकास कार्य बाधित हो रहा है इस पर भी कोई कार्यवाही नहीं हुई क्योकि बंगला खर्चा अदा कर दिया गया था, इस पर अधिकारियो ने झूठा प्रतिवेदन दे दिया जिसके बाद कोई कार्यवाही नहीं हुई,

         दरअसल बेईमानी का सबूत होने के बाद भी कार्यवाही इसलिए नहीं होती क्योकि शिकायतकर्ता कोर्ट नहीं जाता, यदि इसी शिकायत को पहले थाने में देते, यदि थानेदार एफ.आई.आर.नहीं करता तो ३० दिन बाद एस.पी.को देते फिर ३० दिन बाद यदि एस.पी. कार्यवाही नहीं करती तो जिला व सत्र न्यायालय में किसी विद्वान वकील साहब के द्वारा परिवाद दायर करते तो दोषियों के विरुद्ध एफ.आई.आर.होना तय रहता फिर न्यायालय से जमानत लेनी पड़ती पर ज्यादा मामलो पर शिकायतकर्ता थाने में शिकायत नहीं करता है,

     कुल मिलाकर विभाग को शिकायत करने के बाद टाय- टाय फ़ीस हो जाता है यदि एक एक शिकायत को थाने से एस.पी., फिर एस.पी. से जिला व सत्र न्यायालय , फिर जिला व सत्र न्यायालय से हाई कोर्ट और हाई कोर्ट से सुप्रीमकोर्ट कोर्ट तक की लड़ाई लड़ी जावे तो जीत निश्चत है मगर जल संसाधन विभाग में शिकायत करने पर बंगला खर्चा देकर सभी पापो से छुट्टी मिल जाती है .

सबसे ईमानदार शिवनाथ मंडल, जल संसाधन, दुर्ग

छत्तीसगढ़ शासन के पास गत २ साल में सैकड़ो शिकायते शिवनाथ मंडल, जल संसाधन, दुर्ग के कार्यालय तथा उनके अधीन विभिन्न संभाग, उप संभाग तथा सेक्शन के विरुद्ध प्राप्त हुवे जिसमे से ९९.९९ प्रतिशत प्रकरण में शिवनाथ मंडल, जल संसाधन, दुर्ग तथा उनके अधीन विभिन्न संभाग, उप संभाग तथा सेक्शन

के अधिकारियों को क्लीन चीट दे दिया गया है, मतलब साफ है की अभी तक जितने भी शिकायते आई वो झूठी तथा गलत थी, जिसमे से सभी का जिक्र तो नहीं किया जा सकता पर कुछ का जिक्र किया जा रहा है, डोंगरगढ़ थाने में एक लोक सेवक के खिलाफ दर्ज एफ.आई.आर. के बाद उसे ७० करोड़ रुपए के

कार्य में पोस्टिंग कर दी गई थी, इससे ये सन्देश जाता है की छत्तीसगढ़ शासन अपने ही मुताबिक चलती है जन शिकायत से पोस्टिंग का कोई मतलब नहीं है, जिला प्रशासन के अधिकारी सिर्फ आगनबाडी निरीक्षण, कोटवार, प्राइमेरी स्कूलों, पंचायत कर्मी, रोजगार सहायक जैसे छोटे – छोटे गरीब कर्मचारी पर रौब दिखाने है, कभी नहीं सुना होगा की जिला प्रशासन के अधिकारी किसी जल संसाधन के काम को जाकर देखे होगे और किसी कार्यपालन अधिकारी को निलबित करने का प्रस्ताव छत्तीसगढ़ शासन को भेजे होगे, कई बार तो मेरे (मतलब पत्रकार - अनिल अग्रवाल ) दोस्त अधिकारी बताते है की जिला प्रशासन के अधिकारी कार्यपालन अधिकारी के सामने मिन्नत करते नज़र आते है,

                   क्योकि जल संसाधन विभाग के अधिकारी ऊची पहुच रखते है, डोंगरगढ़ के एक वाहन के मामले की जाँच कई साल तक पेंडिग रहने के बाद धीरे से उसे एक साधारण नोटिस देकर खत्म कर दिया गया है, उसके बाद यदि किसी मामले की शिकायत को कार्यपालन अभियंता नस्तीबद्ध करने के लिए लिखते है तो उसी सूर में सूर मिला कर अधिक्षण अभियंता भी पूरे जोर से नस्तीबद्ध करने के लिए लिखते है फिर उससे जोर से सूर से सूर मिला कर मुख्य अभियंता भी नस्तीबद्ध करने के लिए लिख देते है, फिर नस्तीबद्ध करने का सिलसिला चालू हो जाता है, एक अन्य प्रकरण में एक विधानसभा सदस्य ने एक डोंगरगढ़ एनीकट का जोर शोर से शिकायत की फिर कुछ दिन में अपनी ही शिकायत को वापस ले ली, मीडिया में भारी हल्ला होने के बाद मामला डॉ रमन सिंग तक पहुच गया जिसमे शासन की बहुत किरकिरी हुई, कई बार तो डोंगरगढ़ के कई भाजपाई भी जल संसाधन विभाग की शिकायत अपने नेता से करते है जिस पर जल संसाधन विभाग के बेईमान अधिकारी पर कोई कार्यवाही नहीं होती उल्टा शिकायत कर्ता भाजपाई नेता को पार्टी दरकिराने कर देती है और अगली बार से उसे पार्टी अपने बैठक में बुलाना बंद कर देती है,

             ऐसा ही कुछ डोंगरगढ़ और राजनांदगांव के कुछ भाजपाई के साथ हुवा है उन्हे समझ में देर से आया की उनकी औकात पार्टी में दरी – चादर उठाने की भी नहीं है, इसका ज्वलंत उदाहारण भनपुरी ( मुसरा ) एनीकट का है जिन भाजपाई लोगो ने भनपुरी ( मुसरा ) एनीकट का मामला उठाया अब वो डोंगरगढ़ व राजनांदगांव में किनारे लगा दिए है ठीक इसी तरह भनपुरी साजा मामले में सैकडो ग्रामीण जिला प्रशासन से शिकायत की जिला प्रशासन ने मौका में जाकर देखने गये तथा दोषी को मौका पर ही निलबित करने की घोषणा कर दी पर दोषियों पर कार्यवाही नहीं हूई हां जिला प्रशासन का वो अधिकारी जरुर बदल गया है, शिवनाथ मंडल, जल संसाधन, दुर्ग के कार्यालय के अधीन कुछ सब इंजिनियर की औकात जिला प्रशासन के अधिकारियो को बदलने की है इसीलिए शिवनाथ मंडल, जल संसाधन, दुर्ग के कार्यालय के अधीन कुछ सब इंजिनियर के सामने जिला प्रशासन के अधिकारियो को थर थर कापते देखा गया है, इस प्रकार शिवनाथ मंडल, जल संसाधन, दुर्ग के कार्यालय के अधीन इंजिनियर लोग राजा हरीशचंद्र जी से भी ज्यादा ईमानदार है,

             इतनी ईमानदारी के बाद भी कैसे इनके बच्चें निजी मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहे है, कैसे इतनी ईमानदारी के बाद शाही शादी करते है, कैसे इतनी ईमानदारी के बाद जब एंटी करप्शन का छापा पड़ता है तो करोड़ो रुपए की दौलत मिलती है, यह खोज का विषय है.

जल संसाधन विभाग में शिकायत पर कोई कार्यवाही नहीं होती

जल संसाधन विभाग में शिकायत पर कोई कार्यवाही नहीं होती

 

जल संसाधन विभाग में दिनाक १५-३-२०१५ को पनियाजोब जलाशय योजना में लाइनिंग कार्य में अनेक जगह में गड्डे हो गए ऐसी शिकायत मिली, शिकायतकर्ता ने लेख किया की जाँच के नाम पर लीपापोती हो रही है, शिकायतकर्ता ने लेख किया की इस मामले को २ बार छत्तीसगढ़ विधानसभा में उठाया गया था मगर कोई कार्यवाही नहीं हुई, शिकायत को निराधार बता दिया गया।

डोंगरगढ़ थाने ने दिनाक २६-८-२०१३ को एक एफ.आई. आर. धारा ४०९, ४२०, ३४ के तहत दर्ज किया था एक शिकायतकर्ता जो की स्वय को बी. जे. पी. का नेता लिखता है माननीय डॉ रमन सिंग जी को लिखते है की इस आरोपी को निलबित करो पर बी जे पी नेता के पत्र को बिना अहमियत दिए उस आरोपी को ८० करोड़ के प्रॉजेक्ट का चार्जे देकर आरोपी को सम्मानित किया गया.

इसी प्रकार जनवरी २०१३ से अक्टूबर २०१४ तक के मामलो में दुर्ग के एक उप यंत्री के विरुद्ध ९ बिन्दुवो पर शिकायत हुवी पर अफसरों ने उस शिकायत को भी निराधार बता दिया,

हमारे पास शिकायतकर्ता व आरोपी के नाम है पर साइबर एक्ट की मज़बूरी के कारण उनके नाम को सार्वजानिक नहीं कर रहे है.

जल संसाधन विभाग में रोज १०० शिकायत होता है तो ९९ शिकायतों को क्लीनचिट दे दिया जाता है वही अगर १०० परिवाद माननीय न्यायालय में दायर होता है तो उस में से ९९ परिवाद में कार्यवाही होती है।

इसी कारण माननीय न्यायालय में परिवादों की संख्या बढती जा रही है, हम सभी शिकायतकर्ता से निवेदन करते है की वे जल संसाधन विभाग में शिकायत करने की बजाय माननीय न्यायालय में परिवाद दायर करे, इस पर आरोपी अधिकारी को जेल तक जाना पड़ सकता है.वही बेईमान अधिकारी के बच्चे कैसे मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहे है
और छत्तीसगढ़ का किसान आत्महत्या कर रहा है जब
किसी जल संसाधन विभाग के बेईमान अधिकारी के यहाँ क्यो छापा पड़ता है तो करोडो की काली कमाई का खुलासा होता है , ई.ओ.डब्लू की एक अलग टीम बनाना चाहिए जिस पर १० एस.पी., २० एडिशन एस .पी., ४० डी. एस.पी. , १०० थानेदार , ५०० सिपाही को फुल फ्री हैण्ड हो और अन्य स्टाफ समेत पूरा अमला हो जो सिर्फ जल संसाधन विभाग के बेईमानो के यहाँ छापा डाले तब जल संसाधन विभाग के बेईमान जेल में जावेगे तब किसानों के अच्छे दिन आयेंगे, नहीं तो रोज छत्तीसगढ़ के किसान आत्महत्या करेंगे और जल संसाधन विभाग के बेईमान अधिकारी गुलछर्रे उड़ाएंगे।
बेईमानी के धन से बेईमानो अफसरों के बच्चे पढ़ रहे प्राइवेट मेडिकल और मेनजमेंट के कॉलेजों में